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उत्तर प्रदेश: यूपी के बंटवारे की मांग फिर चर्चा में, अंबेडकर से राजभर तक उठती रही आवाज
- Photo by : social media
संक्षेप
उत्तर प्रदेश: प्रदेश के बंटवारे की मांग एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन यह कहानी सिर्फ राजभर के बयान तक सीमित नहीं है। करीब सात दशक पहले अंबेडकर ने भी उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों मे बांटने का सुझाव दिया था।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: प्रदेश के बंटवारे की मांग एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन यह कहानी सिर्फ राजभर के बयान तक सीमित नहीं है। करीब सात दशक पहले अंबेडकर ने भी उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों मे बांटने का सुझाव दिया था। उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री ओमप्रकाश राजभर के एक बयान के बाद यह मामला फिर से सुर्खियों में है। इनसे पहले भी कई लोग इस तरह की मांग कर चुके हैं। करीब 7 दशक पहले डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी यूपी को बांटने का सुझाव दिया था। इसके बाद चौधरी चरण सिंह से लेकर अजीत सिंह और मायावती तक, अलग-अलग दौर में या हम मुद्दा उठाते रहे हैं। अलग उत्तराखंड की मांग को लेकर चले लंबे आंदोलन के बाद साल 2000 में इस राज्य का पहले भी बंटवारा हो चुका है। ब्रिटिश शासन के दौरान उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत कहा जाता था। स्वतंत्र भारत की नई संवैधानिक व्यवस्था के तहत 24 जनवरी 1950 को संयुक्त प्रांत का नाम बदलकर उत्तर प्रदेश कर दिया गया। इस बदलाव के दौरान न तो किसी नए राज्य का गठन हुआ था और न ही राज्य की सीमाओं में कोई बड़ा बदलाव किया गया था बल्कि, मौजूदा राज्य का सिर्फ आधिकारिक नाम बदला गया था। हालांकि, उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों, विकास और रोजगार की कमी, पलायन और प्रशासनिक ज़रूरतें मैदानी इलाकों से अलग होने के कारण अलग राज्य की मांग धीरे-धीरे उठाती रही। 1990 के दशक में यह मांग बड़े जन आंदोलन में बदल गई। इसके बाद केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई और संसद ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 पारित किया। 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश के 13 जिलों को अलग करके उत्तरांचल भारत का नया राज्य बना, जिसे 2007 में उत्तराखंड नाम दिया गया। उत्तर प्रदेश का मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने हाल ही में दावा किया कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के चार हिस्से होना तय है। उन्होंने कहा कि पूर्वाचल राज्य अलग बना तो वहां राजभर समाज का बेटा ही पहला मुख्यमंत्री बनेगा। राजभर ने कहा कि बुंदेलखंड मे अलग राज्य की मांग है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश की मांग उठती रही है,जबकि मध्यांचल और पूर्वांचल को भी अलग राज्य बनाने की मांग है। राजभर जिन चार हिस्सों की बात कर रहे हैं, उनमें पूर्वांचल पूर्वी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र है। यहां आबादी का घनत्व अधिक है और बेरोजगारी व पलायन जैसी चुनौतियां हैं। मध्यांचल का अवध प्रदेश मध्य उत्तर प्रदेश का क्षेत्र है, जिसका केंद्र लखनऊ और कानपुर जैसे बड़े प्रशासनिक और आर्थिक केंद्र हैं। दक्षिणी हिस्से का बुंदेलखंड संसाधनों की कमी और सूखे की समस्या वाला क्षेत्र रहा है, जहां विकास के लिए बड़े जल ढांचा परियोजनाओं को महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं,हरित प्रदेश या पश्चिमी प्रदेश में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र आता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से नजदीकी और मजबूत कृषि ढांचे को इसके आर्थिक विकास की संभावनाओं से जोड़ता है। कांग्रेस नेता इमरान मसूद भी उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने के विचार का समर्थन कर चुके हैं। उन्होंने राज्य के बड़े आकार का हवाला देते हुए कहा कि एक कोने से दूसरे कोने तक जाने में 24 घंटे से ज्यादा समय लग सकता है। उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को न्याय के लिए करीब 800 किलोमीटर तक यात्रा करने की बात कही और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने का सुझाव दिया। उत्तर प्रदेश को बांटने की मांग कई दशक पुरानी है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 1955 में अपनी किताब "भाषावार राज्यों के संबंध में विचार" मे उत्तर प्रदेश को तीन छोटे राज्यों में बांटने का सुझाव दिया था। अंबेडकर ने उत्तर प्रदेश के साथ बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को भी छोटे हिस्सों में बांटने की बात कही थी। उनका प्रस्ताव था कि उत्तर प्रदेश को तीन राज्यों में विभाजित किया जाए। उन्होंने इन तीनों प्रस्तावित राज्यों के लिए मेरठ, कानपुर और इलाहाबाद को राजधानी के तौर पर बताया था। 1955 की राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विधायकों की ओर से राज्य को बांटने का प्रस्ताव भी दर्ज हुआ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 16 जिलों के 97 विधायकों ने एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। हालांकि, बाद में करीब 70 विधायक इस समर्थन से पीछे हट गए। अलग राज्य के समर्थकों का तर्क था कि उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा है और इसे प्रभावी तरीके से चलाना मुश्किल है। उनका कहना था कि पश्चिमी जिलों से पर्याप्त राजस्व आने के बावजूद इन क्षेत्रों की अनदेखी हो रही है। राज्य पुनर्गठन आयोग ने उत्तर प्रदेश विभाजित करने की मांग को स्वीकार नहीं किया और यूपी को एक ही राज्य बनाए रखने की सिफारिश की। हालांकि, आयोग के सदस्य पणिक्कर ने इससे अलग राय दी। उन्होंने बड़े उत्तर प्रदेश को विभाजित करने का समर्थन किया और पश्चिमी हिस्से के लिए मेरठ, आगरा, रोहिलखंड यानी बरेली और झांसी मंडलों को शामिल करने वाला अलग राज्य प्रस्तावित किया था। राज्य पुनर्गठन के बाद भी उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांग खत्म नहीं हुई। पूर्वांचल के लिए अलग राज्य की मांग कई दशकों से चली आ रही है। इसके लिए पूर्वांचल बनाओ मंच और पूर्वांचल राज्य स्थापना समिति जैसे संगठनों ने अभियान चलाए। इसी तरह दक्षिणी हिस्से बुंदेलखंड के लिए भी अलग राज्य की मांग उठती रही। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अलग राज्य की मांग हरित प्रदेश, पश्चिम प्रदेश या पश्चिमांचल जैसे अलग-अलग नामों से सामने आती रही। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग राज्य की मांग को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से जुड़ी राजनीतिक परंपरा में लगातार समर्थन मिला। बाद में उनके बेटे और पूर्व कें नका कहना था कि पश्चिमी जिलों से पर्याप्त राजस्व आने के बावजूद इन क्षेत्रों की अनदेखी हो रही है। राज्य पुनर्गठन आयोग ने उत्तर प्रदेश विभाजित करने की मांग को स्वीकार नहीं किया और यूपी को एक ही राज्य बनाए रखने की सिफारिश की।
