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उत्तर प्रदेश: बहुआयामी प्रतिभा के धनी आर्टिस्ट एस. ए. जाफ़र ‘तौकी़र सा’: रंगों और अल्फ़ाज़ से रचते संवेदनाओं की दुनिया
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: अर्थात् अतीत, वर्तमान और भविष्य के दृष्टा को कवि कहते है। क्रान्त का अर्थ है ’पार’ और दर्शिन् का अर्थ है देखने वाला अर्थात् बहुत गहरा और दूर तक देखने वाला कवि है। फिर चाहे वह कलम व स्याही का उपयोग करे या ब्रश या रंगों का।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: अर्थात् अतीत, वर्तमान और भविष्य के दृष्टा को कवि कहते है। क्रान्त का अर्थ है ’पार’ और दर्शिन् का अर्थ है देखने वाला अर्थात् बहुत गहरा और दूर तक देखने वाला कवि है। फिर चाहे वह कलम व स्याही का उपयोग करे या ब्रश या रंगों का। चाहे उसे शायर कहें या चित्रकार। कल्पना का आश्रय लेकर शायर या चित्रकार गहरी अन्तर्दृष्टि के द्वारा यथार्थ को परखने की क्षमता रखता है। तभी तो कहा गया है जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि। उपरोक्त के परिपेक्ष में सैयद अली जाफ़र एक बहुआयामी चित्रकार के साथ कलम द्वारा प्रकृति और जीवन में गहरी छुपी संवेदनाओं को चित्रित करने में सिद्वहस्त है। गाँव की सोंधी मिट्टी में जन्म लेकर ग्राम्य परिवेश के साथ-साथ शहरी चकाचैंध, भोले-भाले ग्रामीणों की संगति के साथ-साथ शहरी विद्वता व चालबाजी़ का अनुभव करते हुए वे कला व काव्य दोनों को बहुआयामी स्वरूप प्रदान करते हैं। जीवन व प्रकृति के विभिन्न आयामों को चित्रित करने के लिए चित्रकार ने लगभग सभी रंगों से कला को जीवन्तता प्रदान की है। जहाँ कॉल फॉर गॉड, रास लीला, आदम एंड ईव आदि पेंटिंग में आध्यात्मिक व दार्शनिक तत्वों को स्पर्श किया है वहीं भूख, मासूम, स्लीपर क्लास आदि के द्वारा सामाजिक विसंगतियों व आधुनिक समाज की गहरी खाईयों को उभारा है। अंगुलियों, दिल व दिमाग़ का ब्रश व रगों से खेल जब चित्र का रूप लेता है तो यह नयनाभिराम, हृदयस्पर्शी, मोहक चित्रण बरबश दर्शकों का मन आकर्षित कर लेता है। कला व लेखन की अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए डी एस कॉलेज अलीगढ़ के पेंटिंग डिपार्टमेंट का यह उच्च शिक्षित व दीक्षित एसोसियेट प्रोफेसर कला जगत को पूर्णरूपेण समर्पित है। आप आर्ट फ़ैमिली नामक एक अन्तर्राष्ट्रीय कलाकार समूह के अध्यक्ष भी हैं। कला को समर्पित आर्ट फ़ैमिली नामक एक अन्तर्राष्ट्रीय जर्नल का निरन्तर प्रकाशन कर आपने कला जगत के उभरते व दैदीप्यमान सितारों को एक मंच प्रदान करने का भी काम किया है। कलाकारों की नवीन पौध विकसित करने के लिए अपना तन मन धन व समय लगाकर समाज में सौन्दर्यानुभूति विकसित कर सुख व आनन्द वितरण करने का ईश्वरीय कार्य आपके द्वारा हो रहा है। तभी तो आईफेक्स, न्यू दिल्ली ने आपको दो बार आल इंडिया अवार्ड से सम्मानित कर स्वयं को गौरवान्वित किया है। पोएट्री इज़ ए पेंटिंग व्हिच स्पीक जिससे सभी का हित हो, वही साहित्य है। इस हित (वेलफेयर) की परिधि में मानव जाति ही नहीं अपितु जीव-जन्तु संसार और प्रकृति का ज़र्रा-ज़र्रा अपना स्थान ग्रहण करता है। कवि या शायर जीव-जन्तु व प्रकृति के कण-कण की सम्वेदना को अपनी आवाज़ देता है और यह स्वर ही उसे अमरत्व प्रदान करता है। कविता खण्ड-खण्ड विश्व को जोड़ने का काम करती है वह कभी एक को एक के पास लाकर ग्यारह बनाती है और एक को एक से गुणा कर एक बना देती है इसीलिए कविता जोड़ व गुणा है, घटाना तथा भाग नहीं। कविता सन्धि और समास है विग्रह और विन्यास नहीं। काव्य में समास, जोड़ व गुणा का समन्वय प्रस्तुत करते हुए शायर कहता हैः- तहजीब़ का था फ़र्क़ हमारे और उसके बीच’’ उसने कहा कि मैं तो मेरे ’हम’ निकल गया।’’ शायर सैयद अली जाफ़र की ’सुनहरे अल्फाज़’ ’दिल मेरा मुझसे कहे’ तथा ’शहर का दर्द’ पूर्व में प्रकाशित हो चुकी है। उनकी नवीन कृति ’जज़्बात के रंग हज़ार’ को पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गहन वैश्विक मानवीय सम्वेदना से ओतप्रोत शायरी मानव हृदय को अन्दर तक स्पर्श करती है। इस सृष्टि का प्रत्येक अनसुना स्वर शायर की शायरी से आवाज़ पाता है। विनाशोन्मुखी विकास के मायाजाल में जब जीव -जन्तुओं का लोप हो रहा है तब शायर चिड़ियों की दशा पर बेचैन हो कह उठता हैः- उनका भी हक़ है दानों पर खेतों के तुम्हारे’’ खलिहान से चिड़ियों को हकाया नहीं करते’’ कौड़ियों में ये बिकेगा ऐसा कभी सोचा न था।’’ धर्म मनुष्य को फ़रिश्ता बनाने का काम करता है वह सब में एक ही तत्व का दर्शन करता है फिर चाहे वे स्त्री, पुरूष हों या जीव-जन्तु। लेकिन जब यह पूजा-पद्धति के रूप में संकुचित हो जाता है, तब सम्प्रदाय का रूप लेकर मत के आधार पर वैमनस्य व घृणा से भर कर मारकाट को सही मानने लगता है। इस वीभत्स रूप को देखकर शायर जाफ़र की आत्मा चीख़कर बोल पड़ती है। लेके तेरा नाम यह इन्सान क्या-क्या कर गया’’ ’’मारा, काटा नफ़रतों की इन्तहां ही कर गया’’ शायर के आत्मकथात्मक शेर उसके पारिवारिक संस्कार व चारित्रिक गुणों का परिचय इस प्रकार देते हैंः- कुछ ऐसी तरबियत है मिली वालिदैन से,
पेंटिंग इज़ ए साइलेंट पोएट्री एक कुशल चित्रकार के रूप में आपने जीवन के विविध आयामों का सराहनीय चित्रण किया है। आपकी चित्रकारिता का परिणाम व परिमाण इसी से सहज लगाया जा सकता है कि देश व विदेश में मिलाकर शताधिक (127) एकल व सामूहिक कला प्रदर्शनियों का आयोजन विश्व की ख्यातिलब्ध आर्ट गैलरीज़ में आपके द्वारा हो चुका है जिनमें इण्डोनेशिया, साउथ कोरिया, थाईलैण्ड, और बांगलादेश सहित भारत की जहाँगीर आर्ट गैलरी भी शामिल है।
इंसान के अन्दर इंसानियत के साथ-साथ सभी पशु प्रवृत्तियाँ अपनी उच्च विकृत अवस्था में पायी जाती है। यह इंसानियत ही है जो उसे पीर व देव बना देती है। इंसानियत के गिरते स्तर से शायर कराह कर कह उठता हैः- हर चीज की क़ीमत बढ़ी इंसा को छोड़कर, बस ये ही है जो ख़ुद को गिराता चला गया।आदमी सस्ता हुआ मंहगाई के इस दौर में,
कोशिश ज़माना करता, बिगड़ता नहीं हूं मैं। रन्तु सांसारिक जनों के घृणा व नफ़रत भरे रूप को देखकर एक बार वैराग्य से भर शायर इस संसार को छोड़कर भाग जाना चाहता हैः- ’दिल चाहता है मेरा गुफाओं में जा बसूँ, दुनियाँ के चालबाज़ सयानों को देखकर।’’ परन्तु दूसरे ही क्षण वह ज़िन्दादिली की मिसाल पेश करता हुआ दुनियाँ को सन्देश देता है।
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