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गुजरात:  डांग के वासुणा में मौन साधना संग जीव-दया का अनोखा संगम

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गुजरात  Published by: Gheesaram Fuaji Choudhary , Date: 20/03/2026 11:30:09 am Share:
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  • 20/03/2026 11:30:09 am
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संक्षेप

गुजरात: आहवा डांग गुजरात प्रकृति की गोद में बसे डांग जिले के वासुणा गांव में चैत्र मास के इन पवित्र दिनों में आध्यात्मिकता और मानवीय सेवा का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। गुड़ी पड़वा के शुभ मुहूर्त से, चींटी जैसे सूक्ष्म जी

विस्तार

गुजरात: आहवा डांग गुजरात प्रकृति की गोद में बसे डांग जिले के वासुणा गांव में चैत्र मास के इन पवित्र दिनों में आध्यात्मिकता और मानवीय सेवा का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। गुड़ी पड़वा के शुभ मुहूर्त से, चींटी जैसे सूक्ष्म जीवों के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए सूरत गौशाला मंडल द्वारा 1000 श्रीफल के साथ... संपूर्ण नवरात्रि के दौरान ब्रह्मवादिनी पूज्य हेतल दीदी द्वारा एक विशेष 'मौन अनुष्ठान' और 'किड़ियारा' (चींटियों को भोजन देना) भरने के सेवा यज्ञ का प्रारंभ किया गया है। भक्ति और जीव-दया के इस अनोखे समन्वय को पूज्य दीदी ने योग, ध्यान और सत्संग के माध्यम से समझाया है।
साधना और सेवा का संगम भारतीय संस्कृति में चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्व है। इन दिनों में शक्ति की उपासना के साथ आत्मशुद्धि के लिए मौन व्रत धारण करना एक कठिन साधना मानी जाती है। हेतल दीदी ने इन नौ दिनों तक पूर्ण मौन रहकर ईश्वर की आराधना और उपासना करने का संकल्प लिया है। साथ ही, डांग की पवित्र धरती पर 'जीव दया' के मंत्र को सार्थक करते हुए 'किड़ियारा' भरने का अभियान भी चलाया जा रहा है। प्रतिदिन तड़के निश्चित स्थानों पर चींटियों और अन्य सूक्ष्म जीवों के लिए अन्न का मिश्रण अर्पित किया जा रहा है।

भोजन सामग्री: इस सेवा कार्य में 200 किलो बाजरे का आटा, 100 किलो बूरा चीनी, 10 किलो घी, खोपरा (नारियल) और बिस्कुट के मिश्रण का उपयोग किया जा रहा है।
जंगल में श्रीफल (नारियल) रखकर चींटियों के लिए पूरे मानसून की व्यवस्था की गई है, जिससे पर्यावरण और जीव सृष्टि के प्रति जिम्मेदारी निभाई जा सके। इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए दिनेशभाई, अमृतभाई, धनसुखभाई और तेजस्विनी संस्कृति परिवार ने कड़ा परिश्रम किया है। प्रमुख विशेषताएँ: मौन साधना: मानसिक शांति और आंतरिक ऊर्जा के संचय के लिए नौ दिनों के अखंड मौन का संकल्प। जीव सेवा: मौन रहकर भी मूक जीवों की सेवा कर भक्ति को कर्म से जोड़ने का प्रयास, जो "जीव सेवा ही शिव सेवा" के सूत्र को सार्थक करता है।स्थान: यह अनुष्ठान वासुणा (डांग) के शांत और प्राकृतिक वातावरण में  संपन्न हो रहा है।