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उत्तर प्रदेश: श्री हरि मंदिर में श्री राम कथा के पंचम दिवस में ताड़का वध, अहिल्या उद्धार और पुष्पवाटिका प्रसंग का हुआ विस्तारपूर्वक वर्णन

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उत्तर प्रदेश  Published by: Rajnesh shrivastav , उत्तर प्रदेश  Edited By: Kunal, Date: 29/06/2026 02:06:21 pm Share:
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  • Edited By.: Kunal,
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  • 29/06/2026 02:06:21 pm
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: हरि मंदिर मॉडल टाऊन बरेली में ब्रह्मलीन मानस रत्न  डॉ श्रीनाथ मिश्र जी के  सुपौत्र युवा ओजस्वी वक्ता पंडित श्री आशीष मिश्र वाराणसी वालो के की नौ  दिवसीय श्री राम कथा का आज पंचम दिवस था।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: हरि मंदिर मॉडल टाऊन बरेली में ब्रह्मलीन मानस रत्न  डॉ श्रीनाथ मिश्र जी के  सुपौत्र युवा ओजस्वी वक्ता पंडित श्री आशीष मिश्र वाराणसी वालो के की नौ  दिवसीय श्री राम कथा का आज पंचम दिवस था। मंदिर प्रबंध समिति अध्यक्ष सुशील अरोरा व सचिव रवि छाबड़ा व अन्य सदस्यों रमेश खनिजों द्वारा महाराज जी का माल्यार्पण कर  आज की कथा की शुरुआत हुई।वाराणसी धाम से पधारे युवा ओजस्वी वक्ता पंडित आशीष मिश्र ने अपने व्यक्तय में कहा भगवान श्रीराम के जन्म के उपरांत अयोध्या नगरी आनंद और उत्सव में डूब गई। महाराज दशरथ के महल में चारों राजकुमार—भगवान श्रीराम, भरतजी, लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी—धीरे-धीरे बाल्यावस्था में प्रवेश करने लगे। गोस्वामी तुलसीदास जी वर्णन करते हैं कि भगवान स्वयं बालरूप धारण करके ऐसी-ऐसी लीलाएँ करते थे, जिन्हें देखकर माता-पिता, गुरुजन और समस्त अयोध्यावासी आनंद से विभोर हो जाते थे।
बालक श्रीराम कभी अपने छोटे-छोटे चरणों से आँगन में दौड़ते, कभी अपने भाइयों के साथ खेलते, तो कभी माता कौशल्या की गोद में बैठकर उन्हें परम आनंद प्रदान करते। उनका प्रत्येक हाव-भाव, प्रत्येक मुस्कान और प्रत्येक चेष्टा भक्तों के हृदय को मोहित कर लेने वाली थी। भगवान की बाललीलाओं को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं आनंद ने बालरूप धारण कर लिया हो।
समय व्यतीत हुआ और चारों भाइयों ने गुरु वशिष्ठ के आश्रम में जाकर शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने अल्प समय में ही वेद, वेदांग, धनुर्वेद, नीति, धर्म और समस्त विद्याओं में पारंगतता प्राप्त कर ली। तभी एक दिन महान तपस्वी विश्वामित्र ऋषि महाराज दशरथ की सभा में पधारे। उन्होंने राजा से निवेदन किया कि उनके यज्ञों को राक्षसों द्वारा बार-बार नष्ट किया जा रहा है, अतः वे भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी को अपने साथ भेज दें।
महाराज दशरथ पहले तो विचलित हुए, परंतु गुरु वशिष्ठ की आज्ञा और प्रेरणा से उन्होंने भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी को विश्वामित्र ऋषि के साथ भेज दिया। यहीं से भगवान की एक नई और दिव्य लीला का प्रारंभ हुआ।
वन में पहुँचकर भगवान श्रीराम ने सबसे पहले ताड़का नामक भयंकर राक्षसी का वध किया। ताड़का अत्यंत बलशाली और आतंक फैलाने वाली थी। उसने ऋषियों के यज्ञ, तपस्या और धर्मकार्य को बाधित कर रखा था। भगवान श्रीराम ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए अपने दिव्य बाण से उसका संहार किया और समस्त ऋषियों को भयमुक्त किया। ताड़कावध केवल एक राक्षसी का वध नहीं था, बल्कि अधर्म, आतंक और अन्याय पर धर्म की विजय का उद्घोष था।
इसके पश्चात भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी विश्वामित्र जी के साथ आगे बढ़े। मार्ग में उन्हें एक निर्जन आश्रम दिखाई दिया। भगवान ने उसके विषय में पूछा, तब विश्वामित्र जी ने बताया कि यह महर्षि गौतम का आश्रम है और यहाँ उनकी पत्नी अहिल्या शापवश शिला रूप में निवास कर रही हैं।
जैसे ही भगवान श्रीराम ने उस शिला को अपने चरणों का स्पर्श दिया, वैसे ही वह शिला पुनः दिव्य स्वरूप वाली देवी अहिल्या में परिवर्तित हो गई। अहिल्या जी ने भगवान के चरणों में गिरकर उनकी स्तुति की और अपने उद्धार के लिए कृतज्ञता प्रकट की। यह प्रसंग हमें यह संदेश देता है कि भगवान का एक मात्र चरणस्पर्श भी जीव को समस्त पापों और बंधनों से मुक्त कर सकता है।
अहिल्या उद्धार के बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी मिथिला नगरी की ओर प्रस्थान करने लगे। जब वे जनकपुरी की सीमा में पहुँचे, तब वहाँ के लोगों ने उन दोनों दिव्य राजकुमारों को देखकर आश्चर्य और आनंद का अनुभव किया। जनकपुर की गलियाँ, मार्ग, उपवन और भवन मानो स्वयं भगवान के स्वागत के लिए सज उठे थे।
भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी जब जनकपुरी की सड़कों पर भ्रमण करने निकले, तब नगरवासी उनके अलौकिक सौंदर्य को देखकर मुग्ध हो गए। कोई कहता था कि ये देवता हैं, कोई कहता था कि ये स्वयं नारायण हैं, तो कोई उनकी छवि को निहारते-निहारते अपने आप को ही भूल जाता था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने जनकपुरवासियों के उस भाव और आनंद का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है।
इसी क्रम में आता है रामचरितमानस का अत्यंत मधुर और भक्तों के हृदय को स्पंदित कर देने वाला प्रसंग—पुष्पवाटिका लीला।
एक दिन गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी पुष्प लेने के लिए जनकपुरी की सुंदर पुष्पवाटिका में पहुँचे। उसी समय माता सीता भी अपनी सखियों के साथ गिरिजा पूजन के लिए उसी वाटिका में आई थीं। जैसे ही माता सीता ने भगवान श्रीराम का दर्शन किया, उनका मन भगवान के चरणों में स्थिर हो गया। दूसरी ओर, भगवान श्रीराम ने भी जनकनंदिनी सीता जी के दिव्य स्वरूप का दर्शन किया।
यह कोई सामान्य मिलन नहीं था। यह आदि शक्ति और परब्रह्म का मिलन था। यह वह दिव्य क्षण था, जिसकी प्रतीक्षा स्वयं देवता भी कर रहे थे। माता सीता ने गिरिजा माता के समक्ष प्रार्थना की कि उन्हें भगवान श्रीराम ही पति रूप में प्राप्त हों। माता गिरिजा ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया।
पुष्पवाटिका की यह लीला हमें सिखाती है कि भगवान और भक्त का संबंध केवल इस जन्म का नहीं, बल्कि अनादि और शाश्वत है। भगवान श्रीराम और माता सीता का यह प्रथम दर्शन प्रेम, मर्यादा, भक्ति और दिव्यता का अद्वितीय उदाहरण है।
मंदिर सचिव रवि छाबड़ा ने बताया कि नौ दिवसीय श्री राम कथा 2 जुलाई तक प्रत्येक दिन शाम 6.30 बजे से 9.30 बजे तक होगी। पिछले वर्ष भी महाराज जी कथा का लाभ बरेली के सभी रसिक जनो को प्राप्त हुआ था। 
श्री हरि मंदिर प्रबंध समिति एवं अखिल भारतीय श्री राधा संकीर्तन मंडल, कृष्णे परिवार आप सभी भक्तजनों को इस दिव्य श्री राम कथा में सादर सपरिवार आमंत्रित करती है। आज की कथा में सुशील अरोरा, रवि छाबड़ा,अतुल कपूर, युधिष्ठिर मालिक,सुनील मालिक,राम अवतार लूथरा,मिक्की आहूजा, बी.के.कोचर,धीरज सेठी,रमेश खनिजों आदि उपस्थित रहे


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