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उत्तर प्रदेश: एनबीआरआई वैज्ञानिकों की बड़ी खोज, जल्द मिलेगा आर्सेनिक-फ्री चावल
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने चावल को आर्सेनिक मुक्त बनाने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने चावल को आर्सेनिक मुक्त बनाने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है। इस खोज से जल्द ही आर्सेनिक- फ्री धान की किस्में विकसित की जा सकेंगी, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अधिक सुरक्षित होगा। संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध से पता चला है कि चावल में मौजूद एक विशेष प्रोटीन ओएसईएलपी धान की जड़ों में प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करता है। यह मिट्टी में मौजूद हानिकारक आर्सेनिक को जड़ों में ही रोक देता है। उसे चावल के दानों तक पहुंचने से रोकता है। इससे चावल मे आर्सेनिक की मात्रा कम होती है और यह मानव स्वास्थ्य के लिए अधिक सुरक्षित बनता है। एनबीआरआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देबाशीष चक्रवर्ती की अगुवाई में हुए इस शोध को अंतर्राष्ट्रीय जर्नल प्लांट, सेल एंड एनवायरनमेंट ने प्रकाशित किया है। इस शोध में वैज्ञानिक खुशबू चावड़ा, डॉ. वसीम सिद्दीकी, डॉ. दीपाली श्रीवास्तव, डॉ. मधु तिवारी,डॉ. सोनिक अंतो और डॉ. सौमित कुमार बेहरा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. देबाशीष के अनुसार, ओएसई एलपी प्रोटीन जड़ों के बाहरी हिस्से यानी एपोप्लास्ट मे आर्सेनिक को रोककर उसके पौधों के ऊपरी हिस्से यानी पौधे के तने,पत्तियों और अंततः चावल के दानों तक पहुंचने की प्रक्रिया को रोक देता है। इससे पौधों की वृद्धि बेहतर होती है। जैविक क्षमता बढ़ती है और आर्सेनिक तनाव सहने की शक्ति विकसित होती है। आर्सेनिक युक्त चावल का लगातार सेवन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह धीरे-धीरे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इससे किडनी, लिवर और हृदय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग का जोखिम भी बढ़ जाता है। बच्चों में मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित हो सकता है। गर्भवतियों और गर्भस्थ के लिए भी यह बेहद हानिकारक माना जाता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर कर देता है। एनबीआरआई निदेशक डॉ. अजीत कुमार शासनी के अनुसार, यह खोज खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि के लिए बड़ा कदम है. इससे भविष्य में करोड़ों लोगों को सुरक्षित और स्वस्थ चावल उपलब्ध कराने का रास्ता खुलेगा और पर्यावरण अनुकूल खेती को भी बढ़ावा मिलेगा।
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