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मध्य प्रदेश: 80 साल पुरानी मोहर्रम मजलिस परंपरा, शिया समुदाय ने इमाम हुसैन की याद में किया आयोजन
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: रतलाम शहर स्थित धाबाई जी का वास में शिया समुदाय द्वारा मोहर्रम की मजलिसों की परंपरा पिछले लगभग 70 से 80 वर्षों से निरंतर निभाई जा रही है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: रतलाम शहर स्थित धाबाई जी का वास में शिया समुदाय द्वारा मोहर्रम की मजलिसों की परंपरा पिछले लगभग 70 से 80 वर्षों से निरंतर निभाई जा रही है। इस धार्मिक और सामाजिक विरासत की नींव मरहूम सैयद लियाकत हुसैन नकवी एवं मरहूम सैयद फरहत हुसैन नकवी ने रखी थी, जिन्हें आज भी समुदाय सम्मान और श्रद्धा के साथ याद करता है। वर्तमान में उनके वंशज सैयद फरजंद अली नकवी, सैयद राहत हुसैन नकवी, सैयद बरकत हुसैन नकवी तथा सैयद वकार हुसैन नकवी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मोहर्रम की 1 तारीख से 10 तारीख तक प्रतिदिन मजलिसों का आयोजन करते हैं। इन मजलिसों में शिया समुदाय के सदस्य बड़ी संख्या में इमामबाड़े में उपस्थित होकर इमाम हुसैन अ.स. और कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। हर वर्ष बाहर से आने वाले मौलाना मजलिसों को संबोधित करते हैं और अहलेबैत अ.स. की शिक्षाओं, कर्बला के संदेश तथा इंसानियत, न्याय और भाईचारे के महत्व पर प्रकाश डालते हैं। मोहर्रम 1448 हिजरी 2026 मजलिस का आगाज़ उत्तर प्रदेश से तशरीफ़ ला रहे मौलाना अली नवाज़ साहब की तक़रीर से होगा। मौलाना साहब अपने बयान में कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन अ.स. और उनके वफ़ादार साथियों पर ढाए गए ज़ुल्म, कुर्बानियों और इंसानियत के लिए दिए गए पैग़ाम को बयान करेंगे। मजलिस के दौरान इमाम हुसैन अ.स. की अज़ीम शहादत, अहलेबैत अ.स. की कुर्बानियों और कर्बला के दर्दनाक वाक़ियात पर रौशनी डाली जाएगी। मजलिसों के दौरान इमाम हुसैन अ.स. की याद में देश और दुनिया में अमन, चैन, शांति और खुशहाली के लिए विशेष दुआएं की जाती हैं। साथ ही सभी धर्मों और समाजों के लोगों के बीच आपसी भाईचारा, प्रेम, एकता और सौहार्द बना रहे, इसके लिए भी दुआ की जाती है। देश की तरक्की, सुरक्षा और सभी नागरिकों की सलामती के लिए भी हाथ उठाकर दुआ मांगी जाती है। यह परंपरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समुदाय की एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। रतलाम की लगभग 150 सदस्यीय शिया कम्युनिटी और स्थानीय शिया परिवार इस परंपरा को पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाते आ रहे हैं। 70-80 वर्षों से चली आ रही यह धार्मिक विरासत आज भी नई पीढ़ी के हाथों सुरक्षित है, जो अपने बुजुर्गों की अमानत को पूरी जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ा रही है तथा इमाम हुसैन अ.स. के संदेश इंसानियत, शांति और भाईचारे को समाज तक पहुंचा रही है।
