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उत्तर प्रदेश: मियादी बुखार बना आर्थिक संकट: इलाज के खर्च से 70 हजार परिवार कर्जदार

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उत्तर प्रदेश  Published by: Anand Kumar(UP) , Date: 30/03/2026 11:16:08 am Share:
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: भारत में मियादी बुखार (टाइफाइड) अब सिर्फ एक संक्रामक बीमारी नहीं रह गया है, बल्कि यह हजारों परिवारों को आर्थिक तबाही की ओर धकेलने वाला गंभीर संकट बनता जा रहा है. लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड

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उत्तर प्रदेश: भारत में मियादी बुखार (टाइफाइड) अब सिर्फ एक संक्रामक बीमारी नहीं रह गया है, बल्कि यह हजारों परिवारों को आर्थिक तबाही की ओर धकेलने वाला गंभीर संकट बनता जा रहा है. लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों के ताजा अध्ययन के मुताबिक, इस बीमारी के कारण देश को हर साल करीब 12300 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हो रहा है, जिसमें 91 फ़ीसदी खर्च सीधे मरीजों और उनके परिवारों को उठाना पड़ता है. इलाज का बढ़ता बोझ ऐसा है कि 70 हजार से अधिक परिवार कैटास्ट्रोफिक हेल्थ कास्ट की स्थिति में पहुंच चुके हैं, जहां उनकी आय का बड़ा हिस्सा केवल इलाज में खर्च हो रहा है. अध्ययन में स्पष्ट हुआ है कि मियादी बुखार का इलाज कई परिवारों के लिए आर्थिक संकट में बदल चुका है. कैटास्ट्रोफिक हेल्थ का मतलब है कि परिवार अपनी आय का 40 फ़ीसदी से अधिक हिस्सा इलाज पर खर्च करने को मजबूर है. इन स्थिति में उनके लिए भोजन, आवास और रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी करना भी कठिन हो जाता है। 

एक रिपोर्ट के अनुसार मियादी बुखार का सबसे अधिक आर्थिक और स्वास्थ्य प्रभाव 10 साल से कम उम्र के बच्चों पर पड़ रहा है  देश में इसके आगे से ज्यादा मामले महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश से सामने आते हैं, जिनमें शहरी क्षेत्र विशेष रूप से ज्यादा प्रभावित हैं। एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेन्स टाइफाइड के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाएं तेजी से बेअसर हो रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रतिरोधक क्षमता के कारण कुल इलाज खर्च का 87 फ़ीसदी हिस्सा बढ़ रहा है. जनवरी 2026 में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2023 मे भारत में मियादी बुखार के 4930326 मामले दर्ज किए गए, जबकि 7850 लोगों की मौत हुई. इन मामलों का करीब 29 फ़ीसदी बोझ दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक पर रहा. 5 से 9 साल के बच्चों में संक्रमण और दवा प्रतिरोधी मामलों की संख्या सबसे ज्यादा पाई गई, जबकि 6 महीने से 4 साल तक के बच्चों में अस्पताल में भर्ती और मृत्यु का जोखिम अधिक रहा। 

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