-
☰
बिहार: शिक्षा का व्यापारीकरण: मेलों-तमाशों में उलझते विद्यालय
- Photo by : SOCIAL MEDIA
संक्षेप
बिहार: आज‑कल छोटे शहरों के अनेक विद्यालय एक‑दूसरे की नकल में तरह‑तरह के मेले, प्रदर्शनियाँ और दिखावटी कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं जैसे ‘बाल मेला’, ‘साइंस एग्ज़िबिशन’, ‘फ़ूड फ़ेयर’, ‘ट्रेड फ़ेयर’ इत्यादि इत्यादि....
विस्तार
बिहार: आज‑कल छोटे शहरों के अनेक विद्यालय एक‑दूसरे की नकल में तरह‑तरह के मेले, प्रदर्शनियाँ और दिखावटी कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं जैसे ‘बाल मेला’, ‘साइंस एग्ज़िबिशन’, ‘फ़ूड फ़ेयर’, ‘ट्रेड फ़ेयर’ इत्यादि इत्यादि.....जिनका न तो शिक्षा से कोई सार्थक संबंध है और न ही विद्यार्थियों के चरित्र‑निर्माण से। इन गतिविधियों ने बच्चों का मन पाठ‑पुस्तकों से हटाकर व्यर्थ की तैयारियों में उलझा दिया है, कभी अलग शुल्क, कभी अलग पोशाक, कभी अलग सामग्री जैसे अनावश्यक डिमांड से अभिभावकों पर भी अनावश्यक आर्थिक बोझ डाल दिया है। दुःख की बात यह है कि इन कार्यक्रमों में फ़िल्मी गीतों पर नृत्य, DJ, मिमिक्री और अनेक प्रकार के अनुचित अभ्यास कराए जाते हैं, जिससे विद्यालय का शैक्षिक और मर्यादित वातावरण भंग होता है तथा शिक्षकों का मूल्यवान समय नष्ट होता है। यह प्रवृत्ति उस शिक्षा‑दर्शन के प्रतिकूल है जिसकी नींव गंभीरता, अनुशासन और संस्कारों पर रखी गई थी। और भी चिंताजनक यह है कि ऐसे आयोजनों में शिक्षकों और गैर‑शिक्षण कर्मचारियों के बीच अनावश्यक घुल‑मिल और मर्यादा‑भंग की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जो किसी सम्मानित शैक्षणिक संस्था के लिए उचित नहीं। विद्यालय का वास्तविक उद्देश्य ज्ञान देना, बुद्धि को परिष्कृत करना और विद्यार्थियों को भविष्य के लिए तैयार करना है न कि उन्हें मंचों की सजावट बनाकर उनकी एकाग्रता और मासूमियत को नष्ट कर देना।
एक और अत्यन्त गंभीर पक्ष यह है कि इन स्थानीय विद्यालयी कार्यक्रमों में प्रायः ऐसे व्यक्तियों को ‘मुख्य अतिथि’ या ‘विशेष आमंत्रित’ के रूप में बुलाया जाता है जिनका अतीत, वर्तमान और सामाजिक आचरण किसी भी दृष्टि से शैक्षणिक संस्थानों की गरिमा के योग्य नहीं होता। जिन लोगों पर असामाजिक प्रवृत्तियों की छाया हो, जिनका चरित्र संदिग्ध हो, या जिनका सार्वजनिक आचरण स्वयं प्रश्नों के घेरे में हो उन्हें बच्चों के सामने सम्मानित अतिथि के रूप में प्रस्तुत करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह विद्यार्थियों के मन‑मस्तिष्क में गलत आदर्श स्थापित करने जैसा है।
दुर्भाग्य यह है कि ऐसे लोग छोटे शहरों के हर दूसरे‑तीसरे कार्यक्रम में ‘स्थानीय सेलिब्रिटी’ की भाँति घूमते दिखाई देते हैं मानो उनकी उपस्थिति ही किसी आयोजन की शोभा हो जबकि वास्तविकता यह है कि वे किसी भी शिक्षण‑संस्थान के मंच पर बैठने के योग्य नहीं। विद्यालय वह स्थान है जहाँ बच्चों को आदर्श, मर्यादा, चरित्र और अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाता है; वहाँ ऐसे व्यक्तियों की उपस्थिति शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही आहत करती है। विद्यालय‑प्रबंधन और प्रधानाचार्यों को इस विषय पर विशेष गंभीरता से विचार करना चाहिए कि किसी भी कार्यक्रम में किसे मंच दिया जा रहा है। अतिथि का चयन केवल लोकप्रियता, दिखावे या स्थानीय पहचान के आधार पर नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके चरित्र, सामाजिक योगदान और नैतिक विश्वसनीयता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। शैक्षणिक संस्थान समाज का दर्पण होते हैं यदि वहाँ संदिग्ध चरित्र वाले लोग सम्मानित अतिथि बनकर बैठेंगे, तो बच्चों को क्या संदेश जाएगा? समय की माँग है कि प्रधानाचार्य, शिक्षक और अभिभावक मिलकर विचार करें कि क्या हम अपने बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं या उन्हें केवल दिखावे और तमाशे की ओर धकेल रहे हैं। शिक्षा एक पवित्र उत्तरदायित्व है इसे मेलों और दिखावों की भेंट चढ़ाना आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है।