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 उत्तर प्रदेश: अल नीनो का खतरा बढ़ा, कमजोर मानसून से खेती पर पड़ सकता है असर

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उत्तर प्रदेश  Published by: Anand Kumar(UP) , उत्तर प्रदेश  Edited By: Kunal, Date: 06/05/2026 03:59:00 pm Share:
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  • Published by.: Anand Kumar(UP) ,
  • Edited By.: Kunal,
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  • 06/05/2026 03:59:00 pm
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: वैश्विक मौसम एजेंसियों ने एक बार फिर अल नीनो को लेकर चिंता जातायी है. अमेरिका के क्लाइमेट प्रोडिक्शन सेंटर (CPC) के ताजा अपडेट के अनुसार, जून तक ENSO न्यूट्रल स्थिति बनी रह सकती है, लेकिन मई से जुलाई के बीच

विस्तार

उत्तर प्रदेश: वैश्विक मौसम एजेंसियों ने एक बार फिर अल नीनो को लेकर चिंता जातायी है. अमेरिका के क्लाइमेट प्रोडिक्शन सेंटर (CPC) के ताजा अपडेट के अनुसार, जून तक ENSO न्यूट्रल स्थिति बनी रह सकती है, लेकिन मई से जुलाई के बीच 61 प्रतिशत संभावना है कि अल नीनो विकसित हो सकता है,जो सूखे जैसी स्थिति पैदा करता है. रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 से ही पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान(SST) सामान्य से अधिक रहने लगा है. अप्रैल के मध्य तक यह गर्म पानी पूरे भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर मे फैल गया है. यह बदलाव अल नीनो के विकसित होने का संकेत माना जाता है. अल नीनो का सीधा असर भारत के दक्षिण- पश्चिम मानसून पर पड़ता है. भारतीय मौसम विभाग(IMD) ने पहले ही सामान्य से कम मानसून (92%LPA) का अनुमान जताया है. इसका मतलब है कि बारिश कम हो सकती है, जिससे खेती और जल संसाधनों पर असर पड़ेगा. वर्ष 2023 में भी अल नीनो के कारण भारत में सिर्फ 94 प्रतिशत बारिश हुई थी,

 जिससे देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बनी थी, धान, दा लें और तिलहन जैसी खरीफ फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ था. मौसम विभाग के अनुसार अल नीनो का असर जनवरी 2027 तक रह सकता है. इससे अक्टूबर में शुरू होने वाली रबी फसलों की बुवाई भी प्रभावित हो सकती है. वहीं,देश के बड़े जलाशयों में पानी का स्तर फिलहाल 40 प्रतिशत सीधी कम है, जो चिंता बढ़ाता है. वैश्विक एजेंसि यों ने इस बार सुपर अल नीनो की आशंका जताई है, जो 2015 जैसे शक्तिशाली अल नीनो के बराबर या उससे भी ज्यादा प्रभाव डाल सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार, यह 2023 से भी अधिक तीव्र हो सकता है. अल नीनो की बढ़ती संभावना भारत के लिए चिंता का विषय है, खासकर मानसून और खेती के लिहाज से. ऐ से में किसानों को पहले से तैयारी करनी होगी, ताकि कम बारिश और सूखे जैसी स्थिति से निपटा जा सके।