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उत्तराखंड: मकर संक्रांति पर माँ हाट कालिका मंदिर में उमड़ा आस्था का सैलाब, गंगोलीहाट भक्तिमय वातावरण में डूबा
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संक्षेप
उत्तराखंड: गोलीहाट के धार्मिक इतिहास में मकर संक्रांति का अपना एक विशिष्ट महत्व है, और इस वर्ष भी माँ हाट कालिका के दरबार में आस्था का ऐसा ही अपार समुद्र देखने को मिला। मकर संक्रांति के इस पावन पर्व पर समूचा गंगोलीहाट आध्यात्मिक चेतना से सराबोर रहा।
विस्तार
उत्तराखंड: गोलीहाट के धार्मिक इतिहास में मकर संक्रांति का अपना एक विशिष्ट महत्व है, और इस वर्ष भी माँ हाट कालिका के दरबार में आस्था का ऐसा ही अपार समुद्र देखने को मिला। मकर संक्रांति के इस पावन पर्व पर समूचा गंगोलीहाट आध्यात्मिक चेतना से सराबोर रहा। तड़के सुबह, जब सूर्य की पहली किरण भी धरती पर नहीं पड़ी थी, तब से ही मंदिर के कपाट खुलते ही तीर्थपुरोहित पंकज पंत के नेतृत्व में शास्त्रीय विधि-विधान के साथ अनुष्ठान प्रारंभ हुए। माँ हाट कालिका को पंचामृत—दूध, दही, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण—से स्नान कराया गया। इसके पश्चात माँ का दिव्य श्रृंगार किया गया, जिसमें नवीन वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित माँ की छवि देखते ही बन रही थी। पुरोहितों ने विशेष आरती और मंत्रोच्चारण के साथ न केवल उपस्थित जनसमूह, बल्कि समस्त राष्ट्र की सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य की मंगल कामना की। दर्शनार्थियों का उत्साह ऐसा था कि मंदिर परिसर की सीमाएं छोटी पड़ने लगीं। सुबह से ही भक्तों का तांता लगना शुरू हुआ जो सूर्यास्त तक अनवरत जारी रहा। पिथौरागढ़ जनपद के अलावा कुमाऊं के अन्य जिलों, पड़ोसी राज्यों और यहाँ तक कि सात समंदर पार से आए प्रवासी भारतीयों ने भी कतारबद्ध होकर धैर्यपूर्वक अपनी बारी का इंतजार किया। श्रद्धालुओं के मुख से निकलते 'जय माता दी' और 'हाट कालिका की जय' के उद्घोषों से पूरा वातावरण गुंजायमान रहा। इस अवसर पर कुमाऊं की पारंपरिक 'वाम पाद' अर्पण की प्रथा का विशेष रूप से पालन किया गया। भक्तों ने अपने और अपने उन परिजनों के नाम से, जो व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सके थे, माता को वाम पाद अर्पित किए। यह समर्पण भाव इस विश्वास का प्रतीक है कि माँ के चरणों में स्वयं को सौंपने से जीवन के समस्त विघ्न-बाधाएं दूर हो जाती हैं। हाट कालिका मंदिर के साथ-साथ गंगोलीहाट के अन्य धार्मिक स्थलों में भी उत्सव जैसा माहौल रहा। चामुंडा देवी, क्षमा देवी, अंबिका देवी और वैष्णवी देवी मंदिरों में स्थानीय लोगों और पर्यटकों की भारी उपस्थिति दर्ज की गई। कई परिवारों ने मकर संक्रांति के उपलक्ष्य में मंदिरों में विशेष पूजा, हवन और भंडारे का भी आयोजन किया। क्षेत्र की पहाड़ियों पर स्थित इन मंदिरों में भक्तों की भीड़ और भक्तिमयी संगीत ने आज के दिन को एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक पर्व में बदल दिया। स्थानीय व्यापारियों और प्रशासन के सहयोग से श्रद्धालुओं के लिए पेयजल और विश्राम की उचित व्यवस्था की गई थी, जिससे इतनी बड़ी संख्या में भीड़ होने के बावजूद दर्शन सुचारू रूप से चलते रहे।
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