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उत्तराखंड: राज्य आंदोलनकारियों के चिह्नीकरण में भेदभाव का आरोप, 30 साल बाद भी 17 सेनानी पहचान को तरसे

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उत्तराखंड  Published by: Likhit Pant , उत्तराखंड  Edited By: Namita Chauhan, Date: 11/05/2026 02:03:28 pm Share:
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  • Published by.: Likhit Pant ,
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  • 11/05/2026 02:03:28 pm
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संक्षेप

उत्तराखंड: गंगोलीहाट पिथौरागढ़ पृथक उत्तराखंड राज्य निर्माण की वेदी पर अपना भविष्य दांव पर लगाने वाले आंदोलनकारियों के चिह्नीकरण में प्रशासन की बड़ी लापरवाही सामने आई है।

विस्तार

उत्तराखंड: गंगोलीहाट पिथौरागढ़ पृथक उत्तराखंड राज्य निर्माण की वेदी पर अपना भविष्य दांव पर लगाने वाले आंदोलनकारियों के चिह्नीकरण में प्रशासन की बड़ी लापरवाही सामने आई है। मामला गंगोलीहाट विधानसभा क्षेत्र का है, जहाँ तीन दशक बीत जाने के बाद भी 17 आंदोलनकारी अपनी आधिकारिक पहचान के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। प्राप्त दस्तावेज़ों के अनुसार, 20 अगस्त 1994 को राज्य आंदोलन के दौरान गंगोलीहाट में बड़ा प्रदर्शन हुआ था। इस दौरान पुलिस ने 18 आंदोलनकारियों के विरुद्ध थाना बेरीनाग में धारा 147/385/452/504 के तहत मुकदमा पंजीकृत किया था। हालांकि, अक्टूबर 1995 में उत्तर प्रदेश शासन के आदेशानुसार इन मुकदमों को वापस ले लिया गया था, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि ये गिरफ्तारियां राजनीतिक और राज्य आंदोलन से प्रेरित थीं।

साथ जेल गए, पर सम्मान में भेदभाव

मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इसी मुकदमे में नामजद श्री श्यामचरण उप्रेती (पुत्र श्री आनंद उप्रेती) को शासन द्वारा पूर्व में ही 'राज्य आंदोलनकारी' घोषित कर दिया गया है। लेकिन, उन्हीं के साथ उसी घटना में शामिल रहे अन्य 17 आंदोलनकारियों को अब तक यह दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है। क्षेत्रीय जनता और आंदोलनकारियों का कहना है कि जब घटना एक थी और मुकदमा भी साझा था, तो चिह्नीकरण की प्रक्रिया में यह भेदभाव क्यों किया गया? उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी चिह्नीकरण समिति के माध्यम से जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी गंगोलीहाट को भेजे गए पत्र में मांग की गई है कि शेष 17 व्यक्तियों को भी अविलंब राज्य आंदोलनकारी घोषित किया जाए।


न्यायालय के आदेश की प्रति। समिति को सौंपे गए हस्ताक्षरित पत्र में मुकेश रावल, रणजीत सिंह, प्यारे लाल साह, दिनेश बिष्ट, भगवत लाल साह, शंकर लाल साह, राजेन्द्र सिंह और कमला धानिक सहित अन्य आंदोलनकारियों के नाम दर्ज हैं। गंगोलीहाट की जनता अब शासन-प्रशासन की ओर देख रही है कि कब उन 17 सेनानियों के संघर्ष को आधिकारिक मुहर मिलेगी, जिन्होंने राज्य की नींव रखने के लिए लाठियां और जेल की यातनाएं झेली थीं।