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उत्तर प्रदेश: पर्यावरण संरक्षण ही मानवता के सुरक्षित भविष्य की कुंजी
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाया जाने वाला केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है, यह दिवस हमें स्मरण दिलाता है कि पृथ्वी हमारे केवल रहने- बसने का स्थान नहीं, बल्कि हमारी माता है।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाया जाने वाला केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है, यह दिवस हमें स्मरण दिलाता है कि पृथ्वी हमारे केवल रहने- बसने का स्थान नहीं, बल्कि हमारी माता है। सोनभद्र मुख्यालय सहित क्षेत्र के सभी जंगल, पहाड़, नदियां, झीलें, जीव- जंतु और संपूर्ण प्राकृतिक संसाधन मानव और उसके अस्तित्व का आधार स्तंभ है। यदि प्रकृति सुंदर और स्वस्थ रहेगी, तभी मानव सभ्यता की दीर्घकाल तक सुरक्षित रह पाएगी। आज हम चारों तरफ देखते हैं तो विकास की चका चौध के पीछे पर्यावरण का दर्द स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होने लगता है। बढ़ते औद्योगीकरण और मानव दबाव से नदियां प्रदूषित हो रही हैं। भूगर्भीय जल का स्तर लगातार घट रहा है और वायुमंडल के खतरनाक रासायनिक जहर घुलता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम चक्र बदलने लगा है, जिसका आम जनजीवन पर नकारात्मक असर हो रहा है। कहीं भीषण गर्मी से लोगों का जीना मुहाल हो गया है, तो कहीं बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं आम होती जा रही हैं। यह सब सिर्फ प्रकृति के लिए संकट नहीं है, बल्कि मानवता के भविष्य के लिए भी गंभीर चेतावनी है। विडंबना देखिए कि जिस प्रकृति ने हमें इतना खूबसूरत जीवन दिया है, उसी के साथ हमने सबसे ज्यादा अन्याय किया है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने पेड़ों को काटा, नदियों को कचरे का ढेर बनाया और धरती का सीना चीरकर संसाधनों का अंधाधुन दोहन किया है। नतीजा यह हो रहा है कि आज शुद्ध हवा, साफ सुथरा पेयजल और ऑक्सीजन युक्त हरियाली जैसी मूलभूत आवश्यकताएं दुर्लभ होती जा रही हैं। पर्यावरण संरक्षण केवल बड़े संस्थाओं और चुनी हुई सरकारों की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है कि वह इस बारे में संवेदनशील बने। एक छोटा सा पौधा लगाना, पानी और ऊर्जा संसाधनों की बचत करना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना और अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखना भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. जब लाखों लोग छोटे-छोटे प्रयास करते हैं, तभी बड़े परिवर्तन संभव होते हैं. वृक्षारोपण अभियान, जल संरक्षण की पहल और जैव विविधता को बचाने के किया जा रहे प्रयास यह साबित करते हैं कि यदि कुछ अच्छा करने का संकल्प मजबूत हो तो प्रकृति का पुनर्जीवन संभव है. एक पेड़ केवल लकड़ी का स्रोत नहीं होता, वह छाया देता है, वर्षा के लिए अनुकूल परिस्थिति पैदा करता है, पशु पक्षियों को आश्रय देता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार बनता है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। प्राचीन काल से ही हमारे ऋषि- मुनियों ने वृक्षों, नदियों और पर्वतों को देवतुल्य सम्मान दिया था। आज के दौर में आवश्यकता केवल पर्यावरण पर भाषण देने की नहीं, बल्कि जीवन शैली मे बदलाव लाने की है. विश्व पर्यावरण दिवस हम सबको आत्म मंथन का उचित अवसर देता है। यह दिन पूछता है कि क्या हमने अपने बच्चों को हरे- भरे जंगल, स्वच्छ नदियां और नीला आकाश सौंप पाएंगे, या केवल प्रदूषण, जल संकट और जलवायु आपदाओं की विरासत छोड़ेंगे। भूगर्भीय जल का स्तर लगातार घट रहा है और वायुमंडल के खतरनाक रासायनिक जहर घुलता जा रहा है. जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम चक्र बदलने लगा है, जिसका आम जनजीवन पर नकारात्मक असर हो रहा है, कहीं भीषण गर्मी से लोगों का जीना मुहाल हो गया है। तो कहीं बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं आम होती जा रही हैं। यह सब सिर्फ प्रकृति के लिए संकट नहीं है, बल्कि मानवता के भविष्य के लिए भी गंभीर चेतावनी है। विडंबना देखिए कि जिस प्रकृति ने हमें इतना खूबसूरत जीवन दिया है, उसी के साथ हमने सबसे ज्यादा अन्याय किया है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने पेड़ों को काटा, नदियों को कचरे का ढेर बनाया और धरती का सीना चीरकर संसाधनों का अंधाधुन दोहन किया है। नतीजा यह हो रहा है कि आज शुद्ध हवा, साफ सुथरा पेयजल और ऑक्सीजन युक्त हरियाली जैसी मूलभूत आवश्यकताएं दुर्लभ होती जा रही हैं। पर्यावरण संरक्षण केवल बड़े संस्थाओं और चुनी हुई सरकारों की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है कि वह इस बारे में संवेदनशील बने। एक छोटा सा पौधा लगाना, पानी और ऊर्जा संसाधनों की बचत करना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना और अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखना भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जब लाखों लोग छोटे-छोटे प्रयास करते हैं, तभी बड़े परिवर्तन संभव होते हैं. वृक्षारोपण अभियान, जल संरक्षण की पहल और जैव विविधता को बचाने के किया जा रहे प्रयास यह साबित करते हैं कि यदि कुछ अच्छा करने का संकल्प मजबूत हो तो प्रकृति का पुनर्जीवन संभव है। एक पेड़ केवल लकड़ी का स्रोत नहीं होता, वह छाया देता है, वर्षा के लिए अनुकूल परिस्थिति पैदा करता है, पशु पक्षियों को आश्रय देता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार बनता है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। प्राचीन काल से ही हमारे ऋषि- मुनियों ने वृक्षों, नदियों और पर्वतों को देवतुल्य सम्मान दिया था।
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