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दिल्ली: सीवर सफाई में लगातार मर रहे मजदूर: दुनिया मशीनों से आगे, भारत अब भी पीछे क्यों?
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संक्षेप
दिल्ली: हमारे देश में हर दो तीन दिन के बाद देश में कहीं ना कहीं सीवर सफाई करने गए मजदूरों के मौत की खबर आती है. एशियाई देशों में चीन, जापान, मलेशिया जैसे देश पूरी तरह मशीनों का इस्तेमाल करने लगे हैं
विस्तार
दिल्ली: हमारे देश में हर दो तीन दिन के बाद देश में कहीं ना कहीं सीवर सफाई करने गए मजदूरों के मौत की खबर आती है. एशियाई देशों में चीन, जापान, मलेशिया जैसे देश पूरी तरह मशीनों का इस्तेमाल करने लगे हैं 14 मई 2024 – दिल्ली के मॉल में ‘सीवर लाइन’ की सफाई करते समय एक व्यक्ति की मौत 4 मई 2024 – नोएडा में सीवर की सफाई करने उतरे दो मजदूरों की हुई मौत 01 मई 2024 – लखनऊ में सीवर लाइन की सफाई करने उतरे पिता-बेटे की दम घुटने से मौत 23 अप्रैल 2024 – मुज़फ्फरनगर में सीवर लाइन में सफाई कर रहे दो मजदूरों की दम घुटने से मौत 16 सितंबर 2025 - को उत्तर पश्चिम दिल्ली के अशोक विहार क्षेत्र में सीवर की सफाई करते समय एक मजदूर की मौत हो गई और तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। खबरों के अनुसार, उनके सहकर्मियों ने बताया कि सीवर की सफाई के लिए उन्हें नियुक्त करने वाली निजी निर्माण कंपनी द्वारा कोई सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराए गए थे। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2019 से लेकर 31 अक्टूबर (2025) तक सीवर और सेप्टिक टैंकों की खतरनाक सफाई के कारण 471 सफाई कर्मचारियों की जान जा चुकी है. मंत्रालय ने बताया कि यह जानकारी राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (NCSK) द्वारा प्रदान की गई है। मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इन मौतों में से सबसे अधिक 67 मामले तमिलनाडु से सामने आए. इसके बाद महाराष्ट्र से 63, हरियाणा से 51, उत्तर प्रदेश और गुजरात से 49-49 और दिल्ली से 34 मौतें दर्ज की गईं. वहीं, तेलंगाना से 8, आंध्र प्रदेश से 5, बिहार और झारखंड से 4-4, पश्चिम बंगाल से 11 और गोवा व उत्तराखंड से 1-1 मौत की सूचना मिली है। भारत में आमतौर पर सीवर सफाई का अब भी पुराने तौर तरीकों से चलता है. हालांकि कुछ मशीनें कुछ शहरों में जरूर विदेशों से मंगाई गईं लेकिन मोटे तौर पर अब भी मजदूर मेनहोल में नीचे उतरते हैं. कई बार उसमें फंसने तो कई बार उसकी गैस से दम घुटने के कारण वो जान से हाथ धो देते हैं. इस मामले में अमेरिका और यूरोप के देश तो बहुत आगे हैं, कुछ एशियाई देश भी पूरी तरह मशीनीकृत हो चुके हैं. मलेशिया ने तो सीवर सफाई का कायापलट ही कर डाला अब बात करते हैं एशियाई देश मलेशिया की. ये देश 1957 में आजाद हुआ और उसके बाद से ही उसने अपनी सीवर सफाई व्यवस्था पर भी ध्यान देना शुरू किया. पहले वहां भी ये सफाई आदमी ही करते थे लेकिन धीरे धीरे इसे मशीन और फिर चरणबद्ध आटोमेटेड सिस्टम से रिप्लेस कर दिया गया. अब यहां सीवर से जुड़ी सफाई का सारा काम मशीनें करती हैं.
9 अक्टूबर 2024 दिल्ली के सरोजिनी नगर इलाके में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर 3 मजदूरों की मौत का मामला सामने आया है। एक सरकारी इमारत के निर्माण स्थल पर एक भयानक हादसे में 3 मजदूरों की सीवर की गैस से दम घुटने से मौत हो गई। घटना के वक्त साइट पर पुराने सीवर की सफाई का काम चल रहा था। केंद्रीय सरकार की ओर से बनाई जा रही इस बहु-मंजिला इमारत का निर्माण कार्य एक निजी कंपनी को सौंपा गया था। बताया जा रहा है कि सीवर सफाई के दौरान सुरक्षा मानकों का बिल्कुल भी पालन नहीं किया गया। मजदूरों को बिना किसी सुरक्षा उपकरण, यहां तक कि ऑक्सीजन सिलेंडर के बिना ही सीवर में उतार दिया गया।'
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इसे लेकर लंबे समय से आवाज उठाई जाती रही है. हैरानी की बात है कि हमारे देश में सीवर और सीवेज सफाई सिस्टम अब भी पूरी तरह पुराने तौरतरीकों से चल रहा है. अदालती आदेशों के बावजूद इसका मशीनीकरण या आटोमेशन नहीं हो पाया है. सुप्रीम कोर्ट और अदालतें सीवर की मैन्युअल यानि मानवआधारित सफाई को गैरकानूनी ठहरा चुकी हैं, देश में क्या है सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की स्थित भारत में 70 फीसदी सीवेज लाइनों की सफाई आमतौर पर होती ही नहीं. 2015 में एक सर्वे में पता लगा कि तब हमारे देश में 810 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स थे लेकिन चालू हालत में केवल 522 ही थे. बाकि या तो खराब थे या बनने की प्रक्रिया में थे।
मैक्सिको में इकोलाजिकल सेनिटेशन सिस्टम मैक्सिको में सीवेज का पूरा सफाई का काम इकोलॉजिकल सेनिटेशन मॉडल पर होता है, ये मॉडल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स से जुड़ा होता है. ये मानव अपशिष्ट को ट्रीट करता है. इसमें कूडे़ को पहले चरण में अलग अलग रखा जाता है. सूखा कूड़ा अलग और द्रव आधारित वेस्ट अलग। दोनों का ट्रीटमेंट प्लांट्स में अलग तरीकों से होता है, फिर द्रव को ट्रीट करके एग्रीकल्चर के कामों में यूज करते हैं। अमेरिका और यूरोप में पूरी तरह मशीनों का इस्तेमाल अमेरिका में मशीनों का इस्तेमाल होता है. वहां इसके लिए समुचित सुरंगें और उपकरण है, इससे ही काम होता है. इस काम में मानव का इस्तेमाल बहुत कम है। यूरोप में भी यही सिस्टम है. वहां सीवेज और सीवर की सफाई पूरी तरह नई तकनीक आधारित और मशीनों के जरिए होती है. साथ ही आटोमेटेड है. लगातार नई तकनीक से इस प्रक्रिया को बेहतर करने का काम भी चलता रहता है।
लगातार रिसर्च और नए उपकरणों का इस्तेमाल मलेशिया की सीवेज इंडस्ट्री काफी बेहतर स्थिति में है. वो लगातार रिसर्च के बाद बेहतर और नए उपकरणों को पुरानों से बदलती रहती है. फिर वहां की सरकार ने सीवेज कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को सब्डाइज्ड किया हुआ है. वो लगातार सर्वे कराते हैं, लोगों को एजुकेट करते हैं औऱ ये भी बताते हैं कि अपने सैप्टिक टैंक को साफ रखने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए। जापान और सिंगापुर में भी यही सिस्टम मलेशिया में अब कोई सफाई कर्मचारी सेप्टिक टैंक में नहीं उतरता. अगर उसको लगता है कि मशीनों से भी ये साफ नहीं हो पा रहा है तो वो नया सैप्टिक टैंक ही बना देते हैं. कुछ ऐसी ही प्रक्रिया जापान और सिंगापुर में भी है। मशीनें आईं लेकिन इक्का-दुक्का ही इस्तेमाल में ये जरूर है कि भारत में कुछ समय पहले सुलभ इंटरनेशनल ने बाहर से आयात करके दिल्ली में एक सीवेज क्लिनिंग मशीन पेश की थी, जिसकी कीमत तब 43 लाख थी। अब दिल्ली में ऐसी कितनी मशीनें हैं और इनसे कितना काम लिया जाता है-ये जानकारी नहीं है।