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उत्तर प्रदेश: तुलसीदास ने रामचरितमानस के साथ संपत्ति समझौते का भी लिखा था मसौदा

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उत्तर प्रदेश  Published by: Anand Kumar(UP) , उत्तर प्रदेश  Edited By: Kunal Tewatia, Date: 27/08/2026 01:10:09 pm Share:
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  • Published by.: Anand Kumar(UP) ,
  • Edited By.: Kunal Tewatia,
  • Date:
  • 27/08/2026 01:10:09 pm
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास ने धर्म-आध्यात्मक से हटकर भी समाज के लिए काम किए. अकबर के समय में एक प्रतिष्ठित खानदान की संपत्ति का विवाद उन्होंने निपटाया. स्वयं अवधि में समझौता पत्र तैयार किया,

विस्तार

उत्तर प्रदेश: रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास ने धर्म-आध्यात्मक से हटकर भी समाज के लिए काम किए. अकबर के समय में एक प्रतिष्ठित खानदान की संपत्ति का विवाद उन्होंने निपटाया. स्वयं अवधि में समझौता पत्र तैयार किया, जिस पर तत्कालीन काजी ने मुहर लगाई थी. बतौर न्यायिक रिकॉर्ड विधि संग्रहालय में उनका लिखा संधिपत्र (छाया प्रति) संरक्षित है. तुलसीदास का ज्यादा जीवन बनारस (वाराणसी), इलाहाबाद (प्रयागराज) और अयोध्या में बीता. मानस के अलावा विनय पत्रिका, कवितावली जैसी उनकी कई रचनाएं भगवान राम को ही समर्पित रहीं. लेकिन समझौता पत्र उनके व्यक्तित्व अलहदा पक्ष (अलग अथवा भिन्न) को उजागर करता है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के विधि संग्रहालय में रखा संधि पत्र अकबर के नौ रत्नों में एक टोडरमल के परिवार का बताया जाता है. तुलसीदास से उनके अच्छे संबंध थे. संपत्ति बंटवारे को लेकर विवाद हुआ तो टोडरमल ने बड़े- बुजुर्ग के तौर पर तुलसीदास को बुलाया. उन्होंने विवाद निपटाकर खुद समझौता पत्र तैयार किया,

 जिसे कानूनी मान्यता देने के लिए तत्कालीन काजी ने फारसी (तब कोर्ट की भाषा) मे आदेश जारी कर अपने हस्ताक्षर किए थे. संधिपत्र की मूल प्रति बनारस के रामनगर किले में स्थित संग्रहालय में संरक्षित है. विधि संग्रहालय के अधिकारी बताते हैं कि न्यायिक रिकॉर्ड के तौर पर छाया प्रति यहां प्रदर्शित की गई है. देश में कई स्थानों पर तुलसीदास की रचनाएं रखी हैं, जिन पर दावा किया जाता है कि वह उनके हाथ की लिखी हैं. इसके अलावा इससे विस्तृत जानकारी रखने वाले लोगों का कहना है कि जहां कहीं तुलसीदास के हस्तलिपि को लेकर विवाद होता है तो यह समझौता पत्र है, जिससे उनकी राइटिंग का मिलान किया जाता है. पूर्व में राजस्थान के एक विद्वान की भी इसमें मदद ली जा चुकी है. इस मायने में यह महत्वपूर्ण है. तुलसीदास के आध्यात्मिक सफर में प्रयागराज का विशेष महत्व है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग के रह चुके प्रोफेसर का कहना है कि तुलसीदास ने माघ मेले के दौरान ही भारद्वाज मुनि के आश्रम में ही राम कथा सुनी थी. यहीं से उनकी रामभक्ति प्रगाढ़ होती गई. बाद में अयोध्या जाकर रामचरित्र मानस लिखने की शुरुआत की और बनारस के घाट पर उसका समापन किया. इसी के बाद उस घाट का नाम तुलसी घाट किया गया।