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मध्य प्रदेश: शाम होते ही गूंजते हैं संजा के लोकगीत, आधुनिकता के दौर में फीकी पड़ रही परंपरा

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मध्य प्रदेश   Published by: Govardhan , मध्य प्रदेश   Edited By: Kunal Tewatia, Date: 01/10/2026 03:55:11 pm Share:
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संक्षेप

मध्य प्रदेश: लोक संस्कृति का  महा पर्व संजा बाई का गीत हर गली मोहल्ले मे गूंज रहा है नगर सहित गांवों मे उत्साह पूर्वक मनाया जा रहा जो 16 दिन तक मनाया जाएगा इस  पर्व को सांझी संइया  माई संजा देवी सांझी पर्व आदि अन्य नामों से भी जाना जाता है 

विस्तार

मध्य प्रदेश: लोक संस्कृति का  महा पर्व संजा बाई का गीत हर गली मोहल्ले मे गूंज रहा है नगर सहित गांवों मे उत्साह पूर्वक मनाया जा रहा जो 16 दिन तक मनाया जाएगा इस  पर्व को सांझी संइया  माई संजा देवी सांझी पर्व आदि अन्य नामों से भी जाना जाता है 
लेकिन वर्तमान स्थिति में इस पर्व मे आधुनिक तरीके अपनाए जाने लगे हैं शहरों मे अब गोबर के स्थान पर बाजारो मे मिलने वाली कागज या फ्लैक्स से बनी संजा चिपका कर बालिका पूजा करती  है दुर्भाग्य बस इतना है कि हम अच्छी शिक्षा के नाम पर अपनी परम्पराओं को खोते जा रहे हैं  संजा पर्व अनेक गुणो का समावेशी त्यौहार हैं एक ओर जहाँ संजा हमे स्वास्थ्य प्रदान करती है तो दुसरी ओर कला का ज्ञान करवाती है संजा गीतो की लयबद्धता सिखाती है

भारत के कई प्रांतों मे संजा अलग अलग रुप में पूजी जाती है मालवांचल मे संजा कि बात करे तो यहाँ के गांवो मे इसका मजा ही कुछ ओर शाम ढलते  ही बालिकाएं अपने घर की बाहर की दीवारो पर गोबर से  संजा की आकृति सजना शुरु  हो जाती है  उसके बाद फूल चांद व सितारो की आकृतियाँ ओर रंग बिरंगी चमक से श्रृंगार करती है संजा तैयार होने के बाद लड़कियां सामूहिक रुप से पूरे विधि विधान से लोक गीत छोटी - सी गाड़ी गुडकती जाए जे मे बैठी संजा बाई घाघरो धमकाता जाए चूडलो छमकाता जाए संजा बाई जाओ संजा ।  इस गीत के साथ पूजन व आरती कर परिवार की सुख समृद्धि की कामना की जा रही हैं 

आरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया है इसके मांडनो तथा गीतो मे महिलाओं के विवाहित जीवन से जुड़े कई जीवन सूत्र छिपे है या पर्व धार्मिक मान्यतानुसार संजा माता गौरा का रुप होती है जिनसे अच्छे पति पाने कि मनोकामना कि जाती है कई स्थानों पर कन्याए आश्विन माह की प्रतिपदा से इस व्रत की शुरुआत करती है इस त्यौहार को कुंआरी कन्या बहुत ही उत्साह ओर हर्ष से मनाती है यह पर्व  16 दिनो तक इस पर्व की रौनक ग्रामीण क्षेत्रों मे अधिक देखी जा सकती है नगर एवं शहरों मे बदलते समय के साथ परंपरा मे काफी कमी आई है  और धीरे-धीरे आने वाले त्योहारों में काफी बदलाव देखने को मिलेगा।