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राजस्थान: क्षमा वाणी केवल पर्व नहीं, आत्मशुद्धि और विश्व मैत्री का महामंत्र: गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी
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संक्षेप
राजस्थान: दिगंबर जैन मंदिर वरुण पथ मानसरोवर में विराजमान गणिनी आर्यिका 105 विभाश्री माताजी ने कहा कि जैन धर्म में क्षमा वाणी का पर्व केवल परंपरा निभाने का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि
विस्तार
राजस्थान: दिगंबर जैन मंदिर वरुण पथ मानसरोवर में विराजमान गणिनी आर्यिका 105 विभाश्री माताजी ने कहा कि जैन धर्म में क्षमा वाणी का पर्व केवल परंपरा निभाने का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और समस्त जीवों के प्रति मैत्री भावना जागृत करने का महान पर्व है। अनादि काल से चली आ रही यह परंपरा किसी एक समय से प्रारंभ हुई परंपरा नहीं, बल्कि जैन दर्शन की शाश्वत भावना का प्रतीक है। दश लक्षण पर्व, पर्युषण एवं अन्य धार्मिक पर्वों की साधना का मूल उद्देश्य भी आत्मा को पवित्र बनाना, कर्मों का क्षय करना तथा क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों से स्वयं को मुक्त करना है। क्षमा वाणी पर्व के अवसर पर गणिनी आर्यिका 105 विभाश्री माताजी ने कहा कि जब मनुष्य के अंतरंग भाव निर्मल होते हैं, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी वृत्तियां कमजोर होती हैं, तब आत्मचिंतन जागृत होता है। व्यक्ति को अपने द्वारा किए गए अपराधों और गलतियों का बोध होता है और भीतर से क्षमा याचना की भावना उत्पन्न होती है। यही भावना मनुष्य को स्वयं क्षमा मांगने और दूसरों को हृदय से क्षमा करने की प्रेरणा देती है। माताजी ने संदेश देते हुए कहा कि “सबसे क्षमा मांगना और सबको क्षमा कर देना ही विश्व शांति की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।” क्षमा केवल शब्द नहीं, बल्कि मन से राग-द्वेष को दूर करने की साधना है। जब मनुष्य अपने हृदय से वैर, अहंकार और भेदभाव को निकालकर मैत्री को स्थान देता है, तभी वास्तविक शांति की शुरुआत होती है। उन्होंने कहा कि यदि क्षमा की भावना केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित न रहकर हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाए तो परिवारों में प्रेम, समाज में सद्भाव और राष्ट्र में भाईचारा बढ़ सकता है। आत्मशांति से समाज शांति, समाज शांति से शहर शांति, शहर शांति से राज्य शांति, राज्य शांति से देश शांति और देश शांति से विश्व शांति की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। गणिनी आर्यिका 105 विभाश्री माताजी ने सभी से आह्वान किया कि क्षमा वाणी पर्व पर केवल औपचारिक रूप से उत्तम क्षमा हि न कहें, बल्कि इसे अपने जीवन में उतारें। मन में किसी के प्रति राग-द्वेष न रखें, पुरानी कटुताओं को समाप्त करें, भेदभाव छोड़ें और प्रत्येक जीव के प्रति मैत्री एवं करुणा का भाव रखें। उन्होंने कहा कि क्षमा वाणी का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब हमारे शब्दों के साथ हमारे हृदय के भाव भी बदलें। यही भावना परिवारों को जोड़ सकती है, समाज में प्रेम बढ़ा सकती है और मानवता को विश्व बंधुत्व की ओर ले जा सकती है। क्षमा मांगना संस्कार है, क्षमा करना महानता है और क्षमा को जीवन में उतारना ही आत्मशांति एवं विश्व शांति का मार्ग है।
उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया में शांति की आवश्यकता है। ऐसे समय में क्षमा वाणी पर्व का संदेश केवल जैन समाज तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि संपूर्ण मानव समाज तक पहुंचना चाहिए। वर्ष में कम से कम एक बार प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन में झांककर उन सभी लोगों से क्षमा मांगनी चाहिए, जिनके प्रति जाने-अनजाने में कोई अपराध या मन-मुटाव हुआ हो, और स्वयं भी सभी को हृदय से क्षमा कर देना चाहिए।
माताजी ने कहा कि मनुष्य गलतियों का पुतला है। गलतियां हर व्यक्ति से होती हैं, लेकिन अपनी गलती स्वीकार करना, क्षमा मांगना और सामने वाले को बिना किसी भेदभाव के क्षमा कर देना ही मनुष्य की वास्तविक महानता है। क्षमा कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल, संयम और संस्कार की पहचान है।
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